Monday, 16 July 2012

मर्दानगी की यह कैसी परिभाषा !!

“मर्द को दर्द नहीं होता है” फिल्म मर्द में अमिताभ बच्चन का यह डायलॉग कौन भूल सकता है जिन्होंने पूरी फिल्म में अपने आपको एक ऐसे मर्द के रूप में दर्शाया जो हर तरह की मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार है और जो कभी भी अपनी मर्दानगी से अपने दुश्मनों के छक्के छुड़ा सकता है. भारतीय फिल्मों में इस तरह के मर्द वही होते हैं जो नायक की भूमिका में होते हैं. यह नायक अपने परिवार के साथ समाज के कमजोर और पीड़ित लोगों के लिए एक संरक्षक के रूप में काम करता है और जिसके मन में कोई लालच नहीं होता और जो हर समय त्याग के बारे में सोचता है.

आम धारणा है कि मर्द हम उस व्यक्ति को मानते हैं जो शरीर से हृष्ट-पुष्ट हो, बिना डरे हर मुश्किल काम को आसानी से कर जाता हो. जो सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा और दर्द को झलकने न देता हो, पूरे विश्वास के साथ भरा हुआ हो और कभी नकारात्मक सोच न रखता हो. लेकिन अब इन सभी विशेषताओं में एक और विशेषता जुड़ने जा रही है. एक अध्ययन से पता चला है कि जो लोग मांस के प्रेमी हैं और उसे खाने के शौकीन हैं वह मर्द की श्रेणी में आते हैं. यह अध्ययन आपको जरूर आश्चर्यचकित कर रहा होगा लेकिन अमेरिका में किए गए इस अध्ययन ने इस बात को सत्यापित कर दिया है.

पिछले दिनों जर्नल ऑफ कंज्यूमर रिसर्च में प्रकाशित एक नए अध्ययन के मुताबिक जो लोग शाकाहारी (वेजिटेरियन) हैं और जिन्हें मांस खाना तो दूर उसे देखना तक पसंद नहीं है तो उनकी मर्दानगी को सामान्यतया कमतर आंका जाता है. इस शोध में यह भी देखा गया है कि जो लोग मांसाहार को मर्दानगी से जोड़कर देखते हैं उन्हें शाकाहारी बनना पसंद नहीं है. यह अध्य्यन पेनसिल्वेनिया, लुसियाना, नॉर्थ कैरोलिना और कॉरनेल विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों के दल के साथ अमेरिका और ब्रिटेन के लोगों पर किया गया है.

भारत के सन्दर्भ में देखें तो यहां मर्द की परिभाषा अलग है. यहां मर्द उस व्यक्ति को कहा जाता है जो पूरे परिवार पर अपना तुगलकी फरमान जारी करता हो और जो समाज में अपने गौरव को बढ़ाने के लिए घरेलू हिंसा करता हो. कथित तौर पर यहां माना जाता है कि जब तक व्यक्ति दिन में दो बार अपनी पत्नी पिटाई न करे तब तक उसकी मर्दानगी बाहर नहीं आती है. लेकिन कुछ ऐसे भी मर्द हैं जो अपनी मर्दानगी को एक जिम्मेदारी के रूप देखते हैं. जिनका मकसद होता है अपने परिवार को आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल बनाया जाए.

इस तरह का अध्ययन भले ही इंसान को मर्द बनाता हो लेकिन जब हम इसके दूसरे पहलू पर नजर डालते हैं तो दिखाई देता है कि इस दिखावटी मर्द के लिए हमने बहुत सारे जीव-जंतुओं को मौत के घाट उतार दिया. एक और सवाल इससे यह भी खड़ा होता है कि आखिर वास्तविक मर्द किसे माना जाए – उन्हें जो दूसरों को सताने में विश्वास करते हैं या उन्हें जो दूसरों की मदद करते हैं.

 

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