Monday, 16 July 2012

“सिरफिरे गड्ढे”

बूढ़े हो चले शहर को जैसे जवान होने का गंदा शौक हो चला था , चिलचिलाती धुप जैसे उसके साहस के  गिरेबान को पकड़ कर धोबी पछाड़ देने की भरसक कोशिश कर रही थी , पर सच है जब दिमाग पर कोई जुनूनी फितूर चढ़ता है ना तो कुछ नहीं समझ आता , न ही कोई उसे रोक सकता , ठीक ऐसा ही साहित्यिक जूनून, मुझे कब बदल गया पता ही नहीं चला ,
अब तो सोते-जागते आठो पहर विचारो के कीड़े दिमाग की बाती जलाये रखते है , कुलबुलाते रहते है और मुझे भी उबाले रखते है , खैर गाडी में बैठा में सोने की भरसक कोशिश कर रहा था और गाडी उड़नपरी की तरह 80 किलोमीटर /घंटा  के पंख लगाए उडी जा रही थी ,
अचानक ड्राइवर बाबु ने गाडी की नकेल कसी तो कनखी भरी आँखों से अनमने मन से जब मैंने  सामने देखा तो बदन के पिंजरे में कैद तोते तपाक से उड़ गय,होश ने धडकनों के टॉप गीअर को दबा दिया ,
सामने इक बड़े से बैनर पर लिखा था “गरीब गड्ढों का धरना प्रदर्शन”, और बैनर जैसे नए कपडे पहने बच्चे की तरह इठला इठला कर मुझे ही मुंह चिढ़ा रहा था, खुन्नस तो आई पर गुस्से को ठन्डे बसते में ये सोचकर रख दिया की भैया नेता लोगो को मामला होगा, क्यूँ पचड़े में पड़ना,
ख़ैर गाडी से उतर 11 नंबर की बस पर सवार मैं धरना प्रदर्शनकारियों को देखने की उत्सुकता में उस तरफ बढ़ा, भीड़ के बादल इस कदर फैले थे की “धरना प्रदर्शनकारियों ” देखना मुश्किल हो रहा था,
ख़ैर जैसे-तैसे धक्कम-मुक्की, रेलम-पेल कर मंच के समीप पहुंचा तो यकीन मानिय शरीर में काटो तो पानी नहीं, गला सुख गया ,
सामने मंच पर गड्ढे ही गड्ढे थे , जीवित गड्ढे , 6×6  के गड्ढे, छोटे गड्ढे , मोटे गड्ढे, बूढ़े गड्ढे , पतले गड्ढे और हाथ में झंडा  लिए थे, जिस पर लिखा था  “नेता जी, हमे बचाओ” ! साथ ही  जोर-जोर से  नारे लगा रहे थे , “हमे बेइमान नेता चाहिय, सडकों पर गड्ढों का आरक्षण चाहिय”
वँही  बिन बुलाये मेहमान की तरह हर जगह पहुचने वाली  ‘नारद’ सरीखी  मीडिया भी अपने अवसर की तलाश में थी ,
और  “धरना प्रदर्शनकारियों ” की संख्या कम देख रिपोर्टर बाबू लगे अवसर का भूजा भूजने ,
रिपोर्टर बाबू : माफ़ कीजिय पर यह आपका व्यक्तिगत मामला लगता है , शायद इस लिय आप जैसे और गड्ढा समुदाय यंहा नहीं पहुंचा !
बुजुर्ग गड्ढा (नेता)  : ये हमारे इमानदार हो रहे नेताओं का प्रकोप और गुंडागर्दी  है, जो उन्होंने सड़क के हाथों हमारी बस्तियां उजड्वा दी ! हमारी शादियाँ बंद करवा दी, और शादी-शुदा गड्ढों की नसबंदी तक करा दी ! अब हम बचे-खुचे गड्ढे ही बचे हैं, इसलिए हमारी संख्या कम है
रिपोर्टर बाबू को जैसे की सबको पता है  नीचा दिखने की खुजली होती है , इसलिय  उसने तत्काल ही —– — -
रिपोर्टर बाबू : पर माफ़ कीजिय आप लोग तो खानदानी अनपढ़ है , फिर आपने ये बेनर कैसे तयार किये , और यदि बाहर से छपवाया तो आपके पास इतना पैसा आया कँहा से !
बुजुर्ग गड्ढा (नेता) :( कुछ सकपकाते हुए) आप ने ठीक कहा ,ये बैनर हमने श्रीमान सज्जन पत्थर पेंटर से बनवाये हैं , हमने जो महान भ्रष्ट, हत्यारे, कमीने  नेताओं की सेवायें की ,उससे जो इनाम मिला ,आज उन्ही को अपनी बात मनवाने के लिए खर्च किया और कुछ नहीं !
रिपोर्टर बाबू : कैसी सेवा ?
तभी नेता जी का अपने चमचो के साथ आगमन — – - – - -
ये देख गड्ढे और जोर जोर से नारे लगाने लगे – - – -”हमे बेइमान नेता चाहिय, सडकों पर गड्ढों का आरक्षण चाहिय”
नेता जी अपने वफादार गड्ढों को इस तरह विद्रोह करते देख सन्न-सुन्न पड़ गए थे !
तभी बुजुर्ग गड्ढा (नेता) : नेता जी हमने आपके लिए क्या क्या नहीं किया ,आपने हमारे कंधो पर बैठ कितने ही वोट कमाए है ,आपके कितने ही पाप हमने अपने गड्ढो में दबाये हैं , कितने ही दुश्मन आपके इन गड्ढों में टपकाए हैं
नेता जी झट से आव देखा न ताव गड्ढों को झूठी दिलासा देते हुए , शीघ्र ही इक कमेटी आपके लिए गठित की जायगी!
बुजुर्ग गड्ढा (नेता) : हमे आपका भरोसा नहीं आपकी जुबान चाहिय ,
अब नेता जी जुबान कँहा से देते, जुबान तो वो  कई टुकड़े कर शहर में बाँट आये थे!
नेता जी अंटी में से हरी पत्तियाँ निकाल चुपके से बुजुर्ग गड्ढा (नेता) की तरफ धीरे से बढाते हुए—-
पर बुजुर्ग गड्ढा (नेता) : बाबु जी जब रहेंगे ही नहीं तो क्या करेंगे इसका, अचार डालेंगे ?
अब तो नेता जी धरम संकट में फस गए, आखिर जिसके नाम पर किस्मत चमकाई, वाही आज गले की हड्डी बन गया था !और किस मुंह से गड्ढे को सड़क पर रहने देने की घोषणा करते !
फिर जाने क्या मन्त्र धीरे से बुजुर्ग गड्ढा (नेता) के कान में पढ़ा की सारे गड्ढे मंच से उठे और चल दिए नेता जी की ऊँगली पकड़ ,
और नेता जी ने फिर जनता का  ये कह उल्लू काट दिया की मेरे शब्दों के जादू ने इन मासूम गड्ढों का ह्रदय परिवर्तन कर दिया है ,
मै सोचने लगा की ये मासूम गड्ढे कंही बाल्मीकि , कालिदास की तरह कोई महाग्रंथ ना लिख दे !
पर मेरे दिमाग का कीड़ा मुझे कहने लगा पता करो ऐसा क्या कह दिया नेता जी , जो सारे के सारे गड्ढे साधू हो गए !
खैर तभी मुझे अपने घर के समीप वाला गुस्सेल गड्ढा दिखाई दिया ,मै उसको चिढाने वाले अंदाज में बोला : बड़े आये थे धरना देने, अनशन करने ?
गुस्सेल गड्ढा : हूं~ हूं~ हूं~ ! तुम्हे क्या पता नेता जी ने हमे कहा की जब तक कंही भी सड़क नई नवेली दुल्हन की तरह सज संवर रही हो , अपना घर सजा रही हो , कंही भी कुछ समय जाकर घूम आना , और जैसे ही बारिश हफ्तावसूली को धमके , तुम भी आकर इनके आँगन में अपना घर बना लेना ,बाकी में संभाल लूंगा ,
और कुछ चिढाने के से अंदाज में गुस्सेल गड्ढा आगे बढ़ गया !
और मै सोचता रहा – - – - – - – - – - -

“वाह रे ! अनशन ,धरना के फैशन का दौर,
सब है क्रांतिकारी साधू , डाकू,लुटेरा ,चोर ” !

 

“दर्द की पैदावार”

बंजर दिल की  खाई में इक ऐसी जगह है ,
जँहा बची उपजाऊ जमीन पर मुर्दा दर्द फिर से उगता है !
जँहा जख्मों  की लाशो के  लाखो पेड़ अब तक ज़िंदा हैं ,
जँहा कान लगाकर  बहरा जिस्म फिर से सुनता है
***

रोज खुदता-खुलता  है जिस्म वंहा भ्रूण ह्त्या की कुदालो से,
वासना की घिनोनी डकैती अक्ल में काला छुरा घोंपता है,
वंहा दिल खुद पालता है दर्द के बगीचे कुकिस्मों के ,
वंहा कब्रों में बगावत का चन्दन उगता है !

***

जँहा दर्द उघाड़ता है दिल पर मढ़ी अंधेपन की परत,
और हर शिखंडी रोंगटे से तमाचा मार के पूछता है !
पूछता है गिरेबान पकड़ मासूमों की तस्करी-मजदूरी को,
बूढ़े माँ-बाप के त्यजने को बेटन से पीट-पीट पूछता है !

***

वंहा दर्द की पैदावार की कोई जात नहीं ,
वो हर मजहब-रंग के आंसू से खुल के गले मिलता है !
जँहा जीभकटा दर्द गूंगा बना नहीं रहता,
जो मुझे मर जाने या कर जाने के लिए कहता है !

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जँहा दर्द पेट भरने को खुराक नहीं खाता,
बस पीता है बेबसी और बेइज्जती का नरक !
जँहा दर्द निकल पड़ा है कफ़न बांधे, पर शायद अभी गफलत है ,
जो कर रहा है अभी इन्सान और हैवान  का फरक !

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सीता और अग्नि परीक्षा (कभी मुक्ति नहीं )

लोकल बस में बैठे हुए मुक्ता ने पीछे खड़ी कनिका को देखा था  तो चौंक गयी ,सहसा उसको अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ,  परन्तु वो  कनिका ही थी . कनिका ,मुक्ता  की सहेली थी.  दोनों ऩे एक दूसरे को देखा तो परन्तु बस में भीड़ इतनी अधिक थी कि  भेंट न हो  सकी.  .दोनों की मिलने और  बहुत सारी बाते करने की हसरत मन में ही रह गयी.वर्षों बाद आज दोनों सखियाँ  बस  एक दूसरे को देख ही सकी.  ,  महानगर की जिंदगी, भागदौड और कोई संपर्क सूत्र नहीं. ! अगले दिन पुनः वही स्थिति थी, कनिका आज भी भीड़ में बहुत पीछे थी और मुक्ता सबसे आगे.परन्तु उस दिन कनिका ने अपना मोबाइल नम्बर उतरने से पूर्व मुक्ता  के पास पहुंचा दिया.
दिन में तो बात नहीं हो सकी.शाम को घर पहुँचने पर मुक्ता ने अवसर मिलते ही कनिका को फोन लगाया ,  थोड़े शिकवे -शिकायतें होने के पश्चात मिलने का स्थान तय किया और सप्ताहंत में दोनों सखियाँ मिलीं.उत्साह और खुशी का ठिकाना नहीं था.बातों का कोई अंत नहीं था और न ही  कोई ओर छोर  . .पिता का स्थानातरण और पारिवारिक समस्याओं के कारण बिछड़ी दोनों मित्र आज आमने सामने थी .मुक्ता अपने पारिवारिक जीवन और जॉब में व्यस्त थी.कनिका से उसके परिवार के विषय में पहुँचने पर कनिका ने बताया कि उसने शादी की ही नहीं.चौंक गयी मुक्ता .उसकी समझ में यह पहेली नहीं आयी क्योंकि  चंचल कनिका तो  कालेज टाइम से ही मस्त वैवाहिक जीवन के स्वप्न देखती थी. बार बार पूछने पर  कनिका कारण बताने के नाम पर अनमनी ही थी, कि मुक्ता ने उससे राधिका दी के विषय में पूछ लिया.राधिका दी कनिका की ममेरी बहिन थी. बस अब तो कनिका स्वयं को रोक नहीं सकी और बिछड़ने से अब तक की कथा के साथ उसने राधिका दी की कथा सुनायी सहेली को.अपूर्व सुंदरी राधिका दी सभी कलाओं में पारंगत थीं.मुक्ता भी फैन थी राधिका दी की.मृदु भाषिणी ,सदा सहयोग के लिए तैयार रहने वाली,रूप +गुणों की खान  राधिका दी से प्रभावित हुए बिना कोई रह नहीं सकता था……
कनिका ने रोते रोते उनकी कहानी मुक्ता को बताई तो मुक्ता भी अपने अश्रुओं पर नियंत्रण नहीं रख सकी.कनिका ने बताया ,
ऍम बी ए करके राधिका दी को बहुत अच्छा जॉब मिल गया.छोटे से शहर की रहने वाली राधिका दी सरलस्वभाव की  थी,अतः जॉब के लिए    मायानगरी मुम्बई   भेजते समय माता-पिता का चित्त भी चिंताओं से भरा था.परन्तु अपने एक बुजुर्ग  मित्र के पास  बेटी के रहने की व्यवस्था हो जाने से  उनको कुछ राहत सी मिली. बहुत सारी हिदायतों के साथ बेटी को अपना भविष्य उज्जवल बनाने के लिए भेज दिया उन्होंने .कम्पनी की बस से ऑफिस आने जाने की  तथा रहने की व्यवस्था हो जाने के कारण अधिक समस्या नहीं हुई राधिका दी को मुम्बई में .घर और यातायात प्रमुख समस्या हैं महानगरों की.
ऑफिस में अपने सहयोगियों से अच्छी पटती थी दी की.आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी,मृदुभाषिणी,सदा सबके साथ सहयोग करने वाली राधिका दी थी  ही ऐसी,जो मिलता प्रभावित हो जाता. मनोहर, उनके  सहकर्मी ने ऑफिस के काम में उनकी बहुत  सहायता की .राधिका दी के हृदय में कृतज्ञता की भावना थी मनोहर के प्रति.प्राय लौटते समय काम निबटा कर साथ साथ ही निकल जाते थे दोनों.कभी  काफी स्नैक्स आदि लेकर राधिका दी ऑफिस बस के स्थान पर ऑटो या लोकल ट्रेन पकड़ कर घर पहुँच जाती थी. आत्मीयता पूर्ण व्यवहार मिलने से दोनों एक दूसरे के साथ अपनी समस्याएं भी शेयर कर लेते.राधिका दी विश्वास भी करने लगी थीं मनोहर का.अचानक ही एक दिन मनोहर ने उनके समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया.राधिका दी को बुरा नहीं लगा क्योंकि उनको भी मनोहर का साथ अच्छा लगने लगा था.अपने माता -पिता से भी उन्होंने कुछ सकुचाते हुए मनोहर के प्रस्ताव के विषय में बताया.भिन्न जाति,रहन-सहन का पता चलने पर माता-पिता को कुछ असहज लग रहा था,परन्तु सगे सम्बन्धियों और मुम्बई वासी मित्र से बात करके उन्होंने मनोहर के विषय में जानकारी करने को कहा.सब कुछ सामान्य देख कर और मनोहर से प्रभावित हो कर मित्र ऩे राधिका दी के पिता को तैयार कर लिया.मनोहर के मातापिता तो किसी सड़क दुर्घटना का शिकार हो स्वर्ग सिधार चुके थे, ,हाँ एक छोटा अविवाहित भाई अवश्य था जो जॉब के कारण दुबई रहता था.
राधिका दी के माता-पिता ऩे मुम्बई आकर मनोहर से स्वयं भी मिलकर दोनों का विवाह सादगी  से  सम्पन्न करा दिया.मनोहर के कोई  दूर के सम्बन्धी और भाई तथा ऑफिस के साथी,मित्र उपस्थित रहे ,कुछ समय वहीँ रूककर वो लोग अपने शहर लौट आये.मनोहर और राधिका दी ऩे अपना अलग घर ले लिया था.घूमने फिरने  में कब समय पंख लगाकर उड़ गया  पता ही नहीं चला.घर, ऑफिस,घूमना- फिरना यही दिनचर्या रहती थी दोनों की.दोनों की जोड़ी लोगों के लिए चर्चा व कुछ के लिए ईर्ष्या का विषय थी. राधिका दी का साथ पाकर मनोहर भी स्वयं को धन्य ही मानते थे.
एक दिन दोनों फिल्म देखकर लौट रहे थे ,बाईक पर सवार मनोहर और राधिका दी को चारों तरफ से कुछ मवाली छाप गुंडों ने घेर लिया. सस्ती बातें करते हुए उन गुंडों के इरादे कुछ नेक नहीं थे.राधिका दी की सुन्दरता को लेकर उन गुंडों के कमेन्ट सुनकर उन दोनों ऩे अनहोनी का  अंदाजा लगा लिया था.दोनों की बहुत देर तक हाथापाई हुई और अंत में वही हुआ जिसका दर उनदोनों को  था ,गुंडे राधिका दी को उठाकर ले गये.मनोहर अकेले हाथ मलते कुछ भी नहीं कर सके.
पुलिस में शिकायत दर्ज कराना ,निरर्थक भागदौड यही सब दो दिन तक चलता रहा.तीसरे दिन राधिका दी भाग कर घर पहुँची ,अपने घर आकर उनको राहत मिली.मनोहर घर पर  ही थे.राधिका दी उनके गले लगकर बिलखती रही.परन्तु उनको अहसास हुआ कि मनोहर की प्रतिक्रिया कुछ विचित्र थी ,उन्होंने कोई ढाढस नहीं बंधाया  दी को. बस औपचारिकता वश उनको चुप कराया.दी की आशा के विपरीत मनोहर ऩे उनसे ढंग से बात भी नहीं की.
दी ऩे   आपबीती सुनाने का प्रयास किया  .परन्तु मनोहर बोले बचा ही क्या है.दी को लगा वो कुछ समझी नहीं उन्होंने पूछा अर्थात? मनोहर का ठंडा सा उत्तर था, दो दिन कैसे रही तुम गुंडों के साथ.लोग क्या कहेंगें ,सोचेंगें.दी तो मानों आसमान से गिरी ,परन्तु मनोहर की सोच नहीं बदली.पति की आँखों में अविश्वास और उपेक्षा,वो भी जब वो पति के साथ ही थीं और निर्दोष थीं.  सहन नहीं कर सकी दी,  और नींद की गोलियाँ खाकर स्वयं चिर निंद्रा में सो गई.
मुक्ता की आँखों  से आंसू झर झर बह रहे थे,कनिका तो अब  कुछ संयत थी,मुक्ता को भी पता चल गया था कि कनिका ने शादी क्यों नहीं की. वो नहीं समझ पा रही थी कि राधिका दी का दोष क्या था ,उनका सौंदर्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु बन गया !,भारी मन और सिसकियों पर काबू पाकर मुक्ता अपने घर को रवाना हुई क्योंकि घर भी दूर था और समय भी बहुत हो चला था.घर पहुंचकर भी उसको इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला कि निर्दोष होने पर भी सीता को ही सदा अग्नि परीक्षा क्यों देनी पड़ती है

 

अगर भ्रष्टाचार खत्म हो गया तो ?

मान के चलिए कि अन्ना हजारे जी के आन्दोलन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया और लोगों के दिमाग बदलने लग गए | लोगों ने रिश्वत लेना और देना बंद कर दिया और कमीशन से तौबा कर ली ……….| नेताओं और अधिकारियों के मन ने उनको धिक्कारना शुरू कर दिया | घर में रिश्वत के पैसे लाने पर बीवी और बच्चों ने धिक्कारना शुरू कर दिया | मतलब ये कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों की आत्मा ने उन्हें कचोटना शुरू कर दिया , उनका जमीर जाग गया तो ……………? सोचिये कितना बड़ा नुक्सान हो जायेगा अगर ऐसा हो गया तो ? फिल्म वालों के लिए वैसे ही कहानी का अकाल पड़ा रहता है हर तीसरी फिल्म तो भ्रष्टाचार पर होती है , भ्रष्टाचार नहीं रहेगा तो फिर कहानी कैसे मिलेगी ? सोचिये उस बेचारे मुसद्दी का जिसने ऑफिस ऑफिस खेलते खेलते अपने बच्चों को पाला और उस को हीरो भी बना दिया | सुनते हैं अब वही मुसद्दी एक फिल्म ” मौसम” भी बना रहा है | आप ही बताइए अगर भ्रष्टाचार नाम का धंधा न रहा होता तो ये बेचारे कैसे जीवन यापन करते ? और अपना वो राम गोपाल वर्मा , जानते तो हैं न ? वो तो कहीं भुट्टा ही बेच रहा होता | फिर भी आप कहते हैं कि इस भ्रष्टाचार को ख़तम करें | काहे भाई ? काहे औरों के पेटों पर लात मार देना चाहते हैं | तनिक उनका भी तो सोचिये जो “कुछ” पाने के चक्कर में नेता जी के इधर उधर लगे रहते हैं ? भले ही दुनिया उन्हें चमचा कहे , मगर उन्हें भी तो अपना घर चलाना है कि नाही ? अगर नेता जी को कहीं से कमीशन या नजराना नहीं मिलेगा तो वो अपने चमचों को क्या देंगे ? अगर चमचों को चासनी नहीं मिलेगी तो वो फिर उधर क्यों मुहं मारने जायेंगे ? और जो वो मुहं मारने वहां नहीं जायेंगे तो नेता जी को पूछेगा कौन ? फिर कैसी राजनीति और काहे के लिए राजनीति ? बिना किसी फायदे के लिए कोई कुछ करता है क्या ? अब वो भगवान श्री कृष्ण तो हैं नहीं कि सोच लें ” कर्म किये जा फल कि इच्छा मत कर |”


इस भ्रष्टाचार के खेल से जाने कितनो के घर चलते हैं | टी.वी. की टी.आर.पी. से रिपोर्टर की तनख्वाह बढती है , अखबार के समाचारों से पत्रकारों का घर चलता है | कुछ नहीं तो कम से कम हम जैसे तुच्छ साहित्यकारों के बारे में ही सोचिये जिन्हें भ्रष्टाचार पर लिखने से कुछ संतुष्टि मिल जाती है |

तो भैया जैसा चल रहा है चलने देने में ही क्या बुराई है ? जब हमारे इतने गुनी और योग्य प्रधानमंत्री को इसमें कोई बुराई नज़र नहीं आती तो आप काहे खामखाँ परेशान होते हैं |

ओम प्रकाश आदित्य जी की एक कविता , इस लेख को कुछ  और बड़ा करने और रोचक बनाने के लिए साथ में दे रहा हूँ !

इधर भी गधे हैं , उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूँ , गधे ही गधे हैं  ||
गधे हँस रहे हैं , आदमी रो रहा है
हिंदुस्तान में ये क्या हो रहा है  ?
ये दिल्ली ये पालम गधों के लिए है
ये संसार सालम गधों के लिए है  ||

मुझे माफ़ करना मैं भटका हुआ था
वो थर्रा था जो भीतर अटका हुआ था !!

 

धरती जो सबसे पावन …

धरती जो सबसे पावन वो धरती हिंदुस्तान की |
लेते वीर जन्म जहाँ वो माटी हिंदुस्तान की ||


कितने हमले हुए यहाँ , खोने ना पाई इसकी शान
मात्रभूमि की रक्षा को यहाँ करता बच्चा बच्चा जां कुर्बान ||


मात्रभूमि की रक्षा को ही यहाँ नारी ने तलवार उठाई थीकरोड़ों लोग आ गए पीछे जब गाँधी ने आवाज़ लगाईं थी ||


मत भूल अशफाक की कुर्बानी को मत भूल भगत के जोश को
फिरंगियों को वापस भगाया , तू भूल गया क्या उस बोस को ? ||


आजाद सरीखे वीरों के दम पर ही अंग्रेजों ने जंग हारी थी
भूल गया क्या उस ऊधम को जिसने डायर को गोली मारी थी ||


इन सब वीरों को भारत की आज़ादी का अरमान था
लड़ा जो हिंद के लिए वो हर वीर महान था ||


उनका ही वंशज है तू , और है भारत वासी
लगता है जन्मभूमि है फिर से कुछ बलिदानों की प्यासी ||


भारत माँ की रक्षा को अपना शीश कटा ले तू
मात्रभूमि पर निछावर होकर कुछ पुण्य कमा ले तू ||

 

विधवा की प्रार्थना 

आज कुछ अलग विषय पर लिखना चाहता था किन्तु समय अभाव और विचार उत्पन्न ना होने की वज़ह से मौलिक लेखन नहीं कर पा रहा हूँ लेकिन इस दरम्यान उर्दू में कुछ बहुत बेहतरीन पढने को मिला तो सोचा , आपके साथ साझा कर लेता हूँ ! आप लोगों ने ” प्रेम रोग ” फिल जरूर देखि होगी जिसमें अभिनेत्री जब विधवा हो जाती है तो कैसी कैसी परम्पराओं को निभाना होता है उसे ! बस इसी विषय पर उर्दू के महान शायर ज़नाब ख्वाजा अल्ताफ हुसैन “हाली ” की नज़्म को आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसका शीर्षक है ” विधवा की प्रार्थना ” (मुनाजात ए बेवा )

तेरे सिवा ए रहम के बानी
कौन सुने ये राम कहानी


एक कहानी हो तो कहूं मैं
एक मुसीबत हो तो सहूँ मैं


गर ससुराल में जाती हूँ मैं
नहस कदम कहलाती हूँ मैं


मायके में जिस वक्त हूँ आती
रो रोकर हूँ सबको रुलाती


सोच में मेरे सारा घर है
मेरे चलन पर सबकी नज़र है


आप को हूँ हर वक्त मिटाती
ना पहनती अच्छा ना हूँ खाती


मेहंदी मैंने लगानी छोड़ी
पट्टी मैंने जमानी छोड़ी


कपडे महीनों में हूँ बदलती
इतर(इत्र) नहीं मैं भूल के मलती


सुरमा नहीं आँखों में लगाती
बाल नहीं बरसों गुन्धवाती


दो दो चाँद नहीं सिर धोती
अठवाड़ों कंघी नहीं होती


आप को याँ तक मैंने मिटाया
पर दुनिया को सब्र ना आया

 

क्या इतना दयनीय है माता-पिता बनना !!

 किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसकी संतान सबसे ज्यादा अहमियत रखती है. दांपत्य जीवन में संतान का आगमन जहां नई जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को लेकर आता है वहीं भावनात्मक और आत्मिक संतुष्टि को भी एक नया आयाम देता है. माता-पिता बनने के बाद विवाहित दंपत्ति एक-दूसरे के साथ उतना समय नहीं बिता पाते जितना वो पहले बिताते थे. इतना ही नहीं उनके काम के घंटों में भी कहीं अधिक वृद्धि हो जाती है लेकिन फिर भी उन्हें अपने बच्चे की देख-रेख करने से ज्यादा और कोई काम नहीं सुहाता.
बहुत से लोगों का यह मानना है कि माता-पिता बनने के बाद व्यक्ति बड़े दयनीय हालातों से गुजरता है. उसे ना तो पूरा आराम मिल पाता है और ना ही वह अपने लिए थोड़ा समय निकाल पाता है. लेकिन हाल ही में कैलिफोर्निया, रिवरसाइड और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा हुए एक साझा अध्ययन में यह बात प्रमाणित की गई है कि माता-पिता के लिए सबसे अनमोल क्षण उनके जीवन में बच्चे का आगमन होता है. काम और जिम्मेदारियों की अधिकता होने के बावजूद अभिभावक के रूप में वह सबसे ज्यादा संतुष्टि महसूस करते हैं.

इस स्टडी की सह-लेखिका एलिजाबेथ डन का कहना है कि अगर आप किसी पार्टी में गए हैं तो वहां आप खुद यह महसूस कर सकते हैं कि जिन मेहमानों की संतान नहीं है उनसे कहीं ज्यादा प्रसन्न वे लोग हैं जिन्हें संतान सुख की प्राप्ति हो चुकी है. इस पूरे अध्ययन के दौरान शोधकर्ता बस यही देखते रहे कि क्या अभिभावक अपने उन साथियों की अपेक्षा ज्यादा परेशान हैं? लेकिन अध्ययन के किसी भी मोड़ पर सर्वेक्षण करने वाले दल को यह नहीं लगा कि संतान का आगमन विवाहित दंपत्ति को मानसिक या शारीरिक थकान या किसी भी प्रकार की परेशानी में डालता है.

अमेरिका और कनाडा के अभिभावकों पर हुए इस सर्वेक्षण द्वारा यह बात पूरी तरह गलत साबित कर दी गई है कि संतान का आगमन माता-पिता के लिए किसी परेशानी से कम नहीं है. अन्य सह-लेखक सोंजा ल्यूबॉरमिस्की का मानना है कि अगर आप अपने बच्चों के साथ रहते हैं और उम्र के एक परिपक्व पड़ाव पर हैं तो आप अपने उन साथियों से कहीं ज्यादा खुशहाल रहेंगे जिनके बच्चे नहीं हैं. सिंगल पैरेंट या युवावस्था में माता-पिता बन जाना एक अपवाद हो सकता है.

शोधकर्ताओं का तो यह भी कहना है कि महिलाओं से ज्यादा पुरुष अपने बच्चे के आगमन को लेकर उत्साहित रहते हैं और उसके आने के बाद वह अपने उन दोस्तों से ज्यादा खुशहाल रहते हैं जिनके बच्चे नहीं हैं.

इस अध्ययन को अगर हम भारतीय परिदृश्य के अनुसार देखें तो पाश्चात्य देशों की तुलना में भारतीय परिवारों में रिश्तों का महत्व कहीं अधिक है. यही कारण है कि भारतीय परिवार में संतान की उत्पत्ति के साथ ही खुशहाली का आगमन भी होता है. माता-पिता बनना किसी भी विवाहित जोड़े के लिए एक बेहद अनमोल क्षण होता है और उसे किसी परेशानी का नाम नहीं दिया जा सकता. संबंधों की मजबूत नींव पर खड़े भारतीय समाज में संतान ही परिवार का भविष्य निर्धारित करती है. माता-पिता अपने बच्चे की खुशियों के लिए अपनी सभी जरूरतों तक को न्यौछावर कर देते हैं और उन्हें इसका जरा भी संकोच नहीं होता. बच्चे की देखभाल करते हुए अगर वह एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत नहीं कर पाते तो भी वह भावनात्मक तौर पर बेहद संतुष्ट महसूस करते हैं. वैसे भी बच्चे के साथ उनके कई सपने और अरमान जुड़े होते हैं इसीलिए वह अपने बच्चे के पालन-पोषण में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते.

उपरोक्त चर्चा और सर्वेक्षण के मद्देनजर एक बात तो प्रमाणित हो ही जाती है कि अभिभावक चाहे किसी भी समाज या देश के क्यों ना हों अपने बच्चों के प्रति उनकी जिम्मेदारियां और भावनाएं समान रहती हैं.