विधवा की प्रार्थना
आज कुछ अलग विषय पर लिखना चाहता था किन्तु समय अभाव और विचार उत्पन्न ना होने की वज़ह से मौलिक लेखन नहीं कर पा रहा हूँ लेकिन इस दरम्यान उर्दू में कुछ बहुत बेहतरीन पढने को मिला तो सोचा , आपके साथ साझा कर लेता हूँ ! आप लोगों ने ” प्रेम रोग ” फिल जरूर देखि होगी जिसमें अभिनेत्री जब विधवा हो जाती है तो कैसी कैसी परम्पराओं को निभाना होता है उसे ! बस इसी विषय पर उर्दू के महान शायर ज़नाब ख्वाजा अल्ताफ हुसैन “हाली ” की नज़्म को आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसका शीर्षक है ” विधवा की प्रार्थना ” (मुनाजात ए बेवा )
तेरे सिवा ए रहम के बानी
कौन सुने ये राम कहानी
एक कहानी हो तो कहूं मैं
एक मुसीबत हो तो सहूँ मैं
गर ससुराल में जाती हूँ मैं
नहस कदम कहलाती हूँ मैं
मायके में जिस वक्त हूँ आती
रो रोकर हूँ सबको रुलाती
सोच में मेरे सारा घर है
मेरे चलन पर सबकी नज़र है
आप को हूँ हर वक्त मिटाती
ना पहनती अच्छा ना हूँ खाती
मेहंदी मैंने लगानी छोड़ी
पट्टी मैंने जमानी छोड़ी
कपडे महीनों में हूँ बदलती
इतर(इत्र) नहीं मैं भूल के मलती
सुरमा नहीं आँखों में लगाती
बाल नहीं बरसों गुन्धवाती
दो दो चाँद नहीं सिर धोती
अठवाड़ों कंघी नहीं होती
आप को याँ तक मैंने मिटाया
पर दुनिया को सब्र ना आया
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