Monday, 16 July 2012

“दर्द की पैदावार”

बंजर दिल की  खाई में इक ऐसी जगह है ,
जँहा बची उपजाऊ जमीन पर मुर्दा दर्द फिर से उगता है !
जँहा जख्मों  की लाशो के  लाखो पेड़ अब तक ज़िंदा हैं ,
जँहा कान लगाकर  बहरा जिस्म फिर से सुनता है
***

रोज खुदता-खुलता  है जिस्म वंहा भ्रूण ह्त्या की कुदालो से,
वासना की घिनोनी डकैती अक्ल में काला छुरा घोंपता है,
वंहा दिल खुद पालता है दर्द के बगीचे कुकिस्मों के ,
वंहा कब्रों में बगावत का चन्दन उगता है !

***

जँहा दर्द उघाड़ता है दिल पर मढ़ी अंधेपन की परत,
और हर शिखंडी रोंगटे से तमाचा मार के पूछता है !
पूछता है गिरेबान पकड़ मासूमों की तस्करी-मजदूरी को,
बूढ़े माँ-बाप के त्यजने को बेटन से पीट-पीट पूछता है !

***

वंहा दर्द की पैदावार की कोई जात नहीं ,
वो हर मजहब-रंग के आंसू से खुल के गले मिलता है !
जँहा जीभकटा दर्द गूंगा बना नहीं रहता,
जो मुझे मर जाने या कर जाने के लिए कहता है !

***

जँहा दर्द पेट भरने को खुराक नहीं खाता,
बस पीता है बेबसी और बेइज्जती का नरक !
जँहा दर्द निकल पड़ा है कफ़न बांधे, पर शायद अभी गफलत है ,
जो कर रहा है अभी इन्सान और हैवान  का फरक !

–*****************—
*****************

 

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home